बरेली में पेट्रोल की बोतल लेकर कलक्ट्रेट पहुंचा किसान, डीएम के सामने छलका दर्द; तुरंत मिला 23 हजार का भुगतान
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बरेली में पेट्रोल की बोतल लेकर कलक्ट्रेट पहुंचा किसान, डीएम के सामने छलका दर्द; तुरंत मिला 23 हजार का भुगतान
सरकारी गोशाला में 63 क्विंटल हरा चारा सप्लाई करने के बाद महीनों से नहीं मिल रहे थे 22,050 रुपये, अधिकारियों के चक्कर काटकर थक चुका था किसान; बच्चों की मिठाई के लिए डीएम ने दिए 950 रुपये, परिवार के लिए चीनी मिल में रोजगार का भी कराया इंतजाम
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बरेली। सरकारी व्यवस्था में महीनों तक अपनी मेहनत की कमाई के लिए भटकता रहा एक किसान आखिरकार बुधवार को इस कदर परेशान हो गया कि पेट्रोल की बोतल लेकर सीधे कलक्ट्रेट पहुंच गया। मामला मीरगंज तहसील के परौरा गांव निवासी किसान महेंद्र सिंह का है। किसान का आरोप था कि सरकारी गोशाला में हरा चारा सप्लाई करने के बावजूद उसे कई महीनों से भुगतान नहीं किया जा रहा था। ग्राम प्रधान से लेकर ब्लॉक और तहसील स्तर के अधिकारियों तक गुहार लगाने के बाद भी जब उसकी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वह जनता दर्शन में जिलाधिकारी अविनाश सिंह के सामने पहुंच गया।
किसान की परेशानी सुनकर डीएम ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को भुगतान कराने के निर्देश दिए। इसके बाद किसान को उसका बकाया 22,050 रुपये दिलाया गया। साथ ही बच्चों के लिए मिठाई खरीदने के नाम पर 950 रुपये अतिरिक्त दिए गए। इतना ही नहीं, परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सेमीखेड़ा सहकारी चीनी मिल में दैनिक वेतन पर रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी कराई गई। प्रशासन की इस त्वरित पहल से लंबे समय से परेशान किसान को बड़ी राहत मिली।
जुलाई में सरकारी गोशाला को सप्लाई किया था 63 क्विंटल हरा चारा
जानकारी के मुताबिक, मीरगंज तहसील के परौरा गांव निवासी महेंद्र सिंह ने जुलाई 2026 में रफियाबाद स्थित सरकारी गोशाला में 63 क्विंटल हरा चारा सप्लाई किया था। चारे का भुगतान 350 रुपये प्रति क्विंटल की दर से तय हुआ था। इस हिसाब से किसान के कुल 22,050 रुपये बनते थे। किसान ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए गोशाला को चारा उपलब्ध करा दिया, लेकिन कई महीने गुजर जाने के बाद भी उसकी मेहनत की रकम नहीं मिली।
धीरे-धीरे बकाया भुगतान किसान के परिवार के लिए बड़ा आर्थिक संकट बन गया। जिस रकम से उसे अपने घरेलू खर्च और बच्चों की जरूरतें पूरी करनी थीं, उसी के लिए उसे लगातार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे थे।
प्रधान, बीडीओ और एसडीएम कार्यालय के लगाए चक्कर, फिर भी नहीं मिला पैसा
किसान महेंद्र सिंह के मुताबिक, भुगतान के लिए उसने सबसे पहले ग्राम प्रधान और संबंधित कर्मचारियों से संपर्क किया। इसके बाद खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) कार्यालय में भी कई बार अपनी फरियाद रखी, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो सका।
किसान का कहना था कि बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद भुगतान नहीं हुआ। आर्थिक तंगी के चलते परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। यहां तक कि बच्चों की स्कूल फीस जमा करने में भी परेशानी आने लगी थी। महीनों की भागदौड़ और लगातार निराशा ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया।
पेट्रोल की बोतल लेकर पहुंचा कलक्ट्रेट, जनता दर्शन में डीएम को बताई आपबीती
बुधवार दोपहर किसान पेट्रोल से भरी बोतल लेकर कलक्ट्रेट पहुंच गया। जनता दर्शन में जिलाधिकारी अविनाश सिंह के सामने उसने अपनी पूरी परेशानी रखी। किसान की स्थिति और उसकी बातों को सुनकर डीएम ने उसे समझाया और शांत कराया।
इसके बाद जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए। नजारत से नाजिर को बुलवाकर किसान के बकाया 22,050 रुपये का भुगतान कराया गया। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिए मिठाई खरीदने को 950 रुपये भी दिए गए। इस तरह किसान को कुल 23,000 रुपये की तत्काल आर्थिक मदद मिली।
सिर्फ बकाया नहीं दिलाया, परिवार की रोजी-रोटी का भी कराया इंतजाम
जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने किसान की आर्थिक परेशानियों को देखते हुए केवल बकाया भुगतान तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रखी। परिवार की आजीविका का स्थायी सहारा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने सेमीखेड़ा सहकारी चीनी मिल के महाप्रबंधक को महेंद्र सिंह के लिए दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
डीएम की इस पहल से किसान को एक तरफ अपनी मेहनत की बकाया रकम मिली, वहीं दूसरी तरफ परिवार के लिए रोजगार का रास्ता भी खुला। हालांकि, इस पूरे मामले ने सरकारी योजनाओं और गोशालाओं में काम करने वाले छोटे किसानों के भुगतान की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं।
एक किसान को अपने ही काम की मजदूरी पाने के लिए पेट्रोल की बोतल लेकर कलक्ट्रेट पहुंचना पड़ा। ऐसे में अब यह सवाल भी अहम है कि आखिर सरकारी गोशाला में चारा सप्लाई करने वाले किसान का भुगतान महीनों तक क्यों अटका रहा और जिम्मेदार स्तर पर समय रहते उसकी समस्या का समाधान क्यों नहीं किया गया?